इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दूसरे वनडे में शतक बनाने के बाद जश्न क्यों नहीं मनाया रोहित ने, जानें वजह
रोहित शर्मा-(एपी)
कटक के बाराबती स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड के बीच चल रहे दूसरे वनडे में भारतीय कप्तान रोहित शर्मा ने अपनी खोई हुई लय वापस पा ली है। ग़ौरतलब है कि इंग्लैंड ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 304 रन बनाए और रोहित के शतक की बदौलत भारत ने शानदार शुरुआत की।
मैच शुरू होने से पहले रोहित की आलोचना हो रही थी क्योंकि पिछले कुछ सीरीज़ में उन्होंने रन नहीं बनाए थे और उन्हें टीम से बाहर करने की मांग की जा रही थी। रोहित के लिए यह एक अहम मैच था और उन्होंने निराश नहीं किया। इसके अलावा रोहित ने शानदार अंदाज़ में छक्का लगाकर अपना शतक पूरा किया।
हालांकि, बाराबती स्टेडियम में असामान्य नज़ारे देखने को मिले, जब हिटमैन ने अपना शतक पूरा होने का जश्न नहीं मनाया। यह रोहित का वनडे में 2 साल में पहला शतक था। जहां प्रशंसक अपने आदर्श को रन बनाते देख खुशी से उछल रहे थे, वहीं रोहित शांत रहे और उन्होंने अपना बल्ला उठाया, जैसा कि आमतौर पर बल्लेबाज़ अर्धशतक पूरा करने के बाद करते हैं।
इस बीच, यह लेख इस बात पर प्रकाश डालेगा कि हिटमैन द्वारा अपना शतक न सही तरीके से ना मनाने के पीछे संभावित कारण क्या हो सकता है।
एक बयान
इस कदम के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि रोहित ने यह बयान जारी किया कि उनका काम अभी ख़त्म नहीं हुआ है। रोहित प्रशंसकों की आलोचना के बाद मैच में उतर रहे हैं। इसलिए, वह आहत हैं और यह साबित करना चाहते हैं कि शतक बनाना और तिहरे अंक तक पहुंचना ही उनका एकमात्र उद्देश्य नहीं है, बल्कि अपनी टीम के लिए जीत सुनिश्चित करना और अंत तक टिके रहना ही उनका अंतिम लक्ष्य है।
रोहित बल्ले से बड़े स्कोर बनाने के लिए जाने जाते हैं और हो सकता है कि उन्होंने वनडे में अपने लिए ऊंचा मानक तय कर दिया हो। इसलिए उन्होंने शतक बनाने पर जश्न नहीं मनाया और 150+ स्कोर या एक और दोहरा शतक बनाने पर नज़र गड़ाए हुए थे।
यह पहली बार नहीं है कि रोहित ने शांत तरीके से जश्न मनाया हो, बल्कि इससे पहले भी कई मौक़ों उन्होंने इस तरह के जश्न का विकल्प चुना है, जो संकेत देता है कि अभी कई और सैंकड़ें आने बाकी हैं और उनके लिए एक शतक लक्ष्य नहीं है और न ही उपलब्धि की भावना है।
एक और संभावित कारण यह हो सकता है कि क्रिकेट पंडितों और नेटिज़न्स द्वारा उन्हें निशाना बनाए जाने और उनके पिछले कारनामों को भूलकर उन्हें बाहर करने की मांग से वह आहत हैं। ऐसी स्थिति में भी, वह अपने आलोचकों को चुप कराने के लिए मौन उत्सव का विकल्प चुन सकते थे और मैदान पर बिना किसी उत्साह के अपने बल्ले को बोलने दे सकते थे।